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तो क्या मोदी सरकार फेल हो चुकी है! जानिये पैसे के मामले में कितने गरीब हुए आप




– क्या आपको पता है, देश में कितने लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं. करीब 80 करोड़ लोग. जिनके पास खाने के लिए ना तो अनाज है और ना ही भोजन खरीदने को पैसे. (तभी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि देश के 80 करोड़ लोगों को सरकार 5 किलो राशन दे रही है.)

क्या आप जानते हैं, वर्ष 2016 में देश में कितने गरीब थे. जवाब है- जनसंख्या करीब 27 प्रतिशत. नंबर के हिसाब से करीब 37 करोड़ लोग. (यह आंकड़ा जुलाई 2019 में जारी हुआ था. जिसके मुताबिक वर्ष 2016-2016 के बीच करीब-करीब 27 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से बाहर निकले.

क्या आप जानते हैं प्रोविडेंट फंड में पैसा जमा करने वाले करीब 6 करोड़ लोगों में से 80 लाख लोगों ने 30 हजार करोड़ रुपये निकाले हैं. क्योंकि उनके पास खर्च करने के लिए पैसे नहीं थे ना ही कर्ज लेने की हैसियत बची है.

आज के हालात क्या हैं, यह इन तथ्यों से समझें

भारत सरकार भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (BPCL) का 53 प्रतिशत हिस्सेदारी सितंबर 2020 में बेच देगी. कंपनी के 2000 कर्मचारियों को वीआरएस देने के लिए कहा गया है. आवेदन करने की अंतिम तारीख 13 अगस्त 2020 है. पर, क्या आप जानते हैं. यह कंपनी कितने मुनाफे में थी. कंपनी हर साल 1000 से लेकर 1500 करोड़ रुपये की आमदनी कर रही थी. फिर भी सरकार इसे बेच देगी. क्योंकि सरकार को इससे 53000 करोड़ रुपया मिलेगा. आज की तारीख में इतनी बड़ी राशि खर्च कर हिस्सेदारी खरीदने की हैसियत किसकी है, यह बताने की जरुरत नहीं.

मिनिस्ट्री ऑफ स्टेटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इंप्लीकेशन का आंकड़ा बताता है कि मोदी सरकार ने जिन 400 से अधिक बड़ी योजनाओं की शुरुआत की थी, वह पैसे के आभाव में रुक सा गया है. इसके कारण उन योजनाओं की लागत करीब 4.05 लाख करोड़ रुपये बढ़ गयी है. ये योजनाएं जो शुरु होते वक्त करीब 20 लाख करोड़ रुपये के थे, वह 24 लाख करोड़ से अधिक के हो गये हैं. पर, सरकार के पास तो पैसे ही नहीं हैं. अब दो ही रास्ता है या तो योजना को बंद कर दिया जाये या फिर और ज्यादा कर्ज लेकर या निजी कंपनियों को हिस्सेदारी देकर शुरु की जाये. बाद में उन्हीं कंपनियों ने टोल टैक्स की तरह पब्लिक से पैसे वसूले.

देश के सबसे विश्वसनीय इंश्योरेंस कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) का NPA बढ़ कर 8.17 प्रतिशत हो गया है. मतलब LIC का 36694 करोड़ रुपया डूब गया है. जिसके लौटने की उम्मीद ना के बराबर है. तभी उन्होंने भविष्य के लिए रखे पैसे निकालने पर मजबूर हुए.

सरकार की आर्थिक सेहत इन आंकड़ों से समझें

– चालू वित्तीय वर्ष (2020-21) के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 30 लाख करोड़ का बजट पेश किया था. जिसमें 24 लाख करोड़ रुपये विभिन्न तरह के टैक्स से आने वाले थे. इसमें जीएसटी से 6.90 लाख करोड़ रुपये, इनकम टैक्स से 6.38 लाख करोड़, कॉरपोरेशन टैक्स से 6.18 लाख करोड़, एक्साइज टैक्स से 1.24 लाख करोड़, विभिन्न तरह के सेस से 1.24 लाख करोड़.

– 1 अप्रैल से 30 जून (पहली तिमाही) तक भारत सरकार को करीब 7.50 लाख करोड़ आने थे. पर आये सिर्फ 1.53 लाख करोड़ रुपये. इसमें टैक्स से करीब 1.34 लाख करोड़ की आय शामिल है.

– बजट में सरकार ने तय किया था कि एनपीए की जो कुल राशि है, उसमें से 5.14 लाख करोड़ की वसूली की जायेगी. मतलब हर माह करीब 50 हजार करोड़ रुपये. लेकिन आंकड़े बताते हैं, पहली तिमाही में सरकार सिर्फ 20 हजार करोड़ रुपये ही वसूल कर सकी है.

– जीएसटी का हिस्सा राज्यों को मिलना है. राज्यों की सरकारें केंद्र सरकार से अपने हिस्से की राशि मांग रही हैं. पर केंद्र सरकार के पास देने को पैसे नहीं है. राज्यों की स्थिति यह हो गयी है कि उन्हें वेतन देने तक के लिए पैसे कम पड़ रहे हैं.

इन तथ्यों से क्या यह संदेश नहीं मिलता है कि आर्थिक स्तर पर हमारी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. लोगों को रोजगार नहीं मिल रहा. इलाज नहीं हो रहा. नौकरी है नहीं. खाने तक के लिए पैसे नहीं है. तभी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी टीवी पर गर्व (शर्मनाक बात को भी) के साथ बताते हैं कि 80 करोड़ लोगों को 5 किलों अनाज दिया जा रहा है.

केंद्र की मोदी सरकार जिस तरह सरकारी संपत्तियों को बेच रही है. बैंकों व कंपनियों के शेयर बेच रही है. उससे यही लगता है जैसे धारा 370, राम मंदिर, NRC की तरह ही मोदी सरकार के चुनावी एजेंडे में सरकारी संपत्तियों को बेचना भी शामिल था. तभी तो देश भी चुप है. जो इक्के-दुक्के लोग विरोध में बोल रहे हैं, उन्हें चुप कराने की कोशिशें जारी हैं. पर लोग चुप हैं. ऐसे-जैसे कुछ हुआ ही नहीं.

ऐसे में सवाल उठने लगा है कि क्या मोदी सरकार देश की अर्थव्यवस्था को संभालने में फेल हो चुकी है. सरकार का बजट फेल हो गया है.
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