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मात्र 7 दिन में लकवे का मरीज इस मंदिर में आने से हो जाता है ठीक, रहस्य जानेंगे तो उड़ जाएंगे होश

 मात्र 7 दिन में लकवे का मरीज इस मंदिर में आने से हो जाता है ठीक - देश में अन्य बीमारियों के साथ लकवा (Paralysis) रोग भी बड़ा रूप लेता जा रहा है। भारत में लाखों-करोड़ों की संख्या में लोग लकवा से पीड़ित हैं। वहीं रोग के आगे चिकित्सा विज्ञान भी कम असरदार है क्योंकि कुछ लोग चिकित्सा पद्धति के ज़रिए ठीक हो जाते हैं तो कुछ लोगों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता है। लेकिन राजस्थान में इस बीमारी के इलाज के लिए एक मंदिर बेहद प्रसिद्ध है। जहां लोगों का मानना है कि केवल परिक्रमा करने से लकवाग्रस्त व्यक्ति ठीक हो जाता है।



राजस्थान में नागौर से करीब 40 किलोमीटर दूर अजमेर-नागौर मार्ग पर कुचेरा क़स्बे के पास स्थित बुटाटी धाम लकवा के रोग (Butati Dham for Treatment of Paralysis) को खत्म करने के लिए जाना जाता है। मान्यता है कि बुटाटी धाम स्थित संत चतुरदास महाराज मन्दिर (Chaturdas JI Maharaj Temple) में केवल सात परिक्रमा लगाने से लकवा रोग का असर धीरे-धीरे कम हो जाता है।


ऐसे लगानी होती है परिक्रमा

बुटाटी धाम की मान्यता ऐसी है कि यहां पूरे देश लकवाग्रस्त पीड़ित आते हैं। मंदिर 7 परिक्रमा से लकवा के रोग से मुक्त कराने के लिए प्रसिद्ध है। यहां लकवा के मरीजों को सात दिन का प्रवास करते हुए रोज एक परिक्रमा लगानी होती है। सुबह की आरती के बाद पहली परिक्रमा मंदिर के बाहर तथा शाम की आरती के बाद दूसरी परिक्रमा मंदिर के अन्दर लगानी होती है। ये दोनों परिक्रमा मिलकर पूरी एक परिक्रमा कहलाती है। सात दिन तक मरीज को इसी प्रकार परिक्रमा लगानी होती है। बूटाटी धाम अपनी चमत्कारी शक्तियों से लकवा सही करने के लिए काफी मशहूर है।


भक्तों में मान्यता है कि परिक्रमा लगाने और हवन कुण्ड की भभूत लगाने से बीमारी धीरे-धीरे अपना प्रभाव कम कर देती है। शरीर के अंग जो हिलते डुलते नहीं हैं वह धीरे-धीरे काम करने लगते हैं।


ये है यहां की मान्यता (Story of Chaturdas Maharaj Butati Dham)

मान्यता है कि लगभग 500 साल पहले संत चतुरदास जी का बुटाटी में निवास हुआ करता था। वे सिद्ध योगी थे और अपनी सिद्धियों से लकवा के रोगियों को रोगमुक्त कर देते थे। आज भी लोग लकवा से मुक्त होने के लिए इनकी समाधी पर सात फेरी लगाते हैं।


बुटाटी गांव के चारण कुल में जन्मे संत चतुरदास महाराज आजीवन ब्रह्मचारी रहे। युवावस्था में हिमालय पर्वत पर रहकर गहन तपस्या करने के बाद वे वापस बुटाटी गांव आ गए। यहां तपस्या व गौ सेवा करने लगे। बाद में वे देवलोक गमन हो गए। प्रचलित दंत कथाओं के अनुसार उन्होंने अपने हिस्से की जमीन दान देने की बात कही। पूर्व में गांव के पश्चिम दिशा में केवल एक चबूतरे के निर्माण से शुरू हुआ बाबा की आस्था का केंद्र अब विशाल मन्दिर व धाम बन गया है।

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