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घरवाले नही चाहते थे, लेकिन माँ ने पूरे परिवार से लड़कर बेटी को पढाया, बेटी आज IAS बन चुकी है




भारतीय समाज में अभी भी बेटियों के लिये कई तरह की बंदिशे है। अभी भी बेटियों को क्या करना है क्या नहीं ये उनके परिजन या यूं कहें तो समाज ही तय करता है। भारत देश की आजादी के 75 वर्ष ही गयें लेकिन इस आजाद देश में बेटियां अब भी स्वतंत्र नहीं हैं। उन्हें अपने सपनों को पूरा करने के लिये कई सारी चुनौतियों को सामना करना पड़ता है। यहीं नहीं हमारे भारतीय समाज में लडकियों के 10वीं, 12वीं तक की पढ़ाई को तो परिजन की मंजूरी मिल जाती हैं। लेकिन यदि लड़की आगे की पढ़ाई की बात करे तो बड़ी ही आसनी से सभी कह देते है ज्यादा पढ़-लिख कर क्या करेगी। भारतीय समाज बेटियों के बाहर जाकर पढ़ाई करने के लिये अक्सर ही राजी नहीं होता। इस कारण कई लडकियों को अपने सपनों के साथ समझौता करना पड़ता है।

आपको आज एक ऐसी ही बेटी और मां के बारें में बताने जा रहें हैं। मां ख़ुद अनपढ़ होते हुयें भी अपनी बेटी के शिक्षा के लिये पूरे परिवार और समाज से लड़ गईं। बेटी ने भी अपनी मां के संघर्ष को बेकार नहीं जाने दिया और एक IAS बनकर अपना और अपने मां के बलिदान को सार्थक कर दिया।

हम बात कर रहें हैं, IAS अनुराधा पाल (Anuradha Pal) की। अनुराधा हरिद्वार (Haridwar) की एक बहुत ही सामान्य परिवार की रहने वाली हैं। उनके पिता दुध बेचकर परिवार का भरण-पोषण करतें थे तथा उनकी माता एक गृहिणी हैं। अनुराधा के घर में पढ़ाई-लिखाई का बिल्कुल माहौल नहीं था। पिता 5वीं पास थे और माता बिल्कुल ही अनपढ़ थी। गांव के सभी परिवारों के तरह अनुराधा के भी परिवार की यही सोच थी कि बेटी बड़ी हो गईं है, जल्दी से शादी कर के अपना फर्ज पूरा कर लेना है।

अनुराधा पढ़ाई में बहुत होशियार थी। उनके पढ़ाई के गुण को देख कर उनकी माता बहुत खुश होती थी और हमेशा अपनी बेटी का पक्ष लेती थी। अनुराधा ने जब 5वीं कक्षा पास की तो जवाहर नवोदय का फॉर्म भरवा दिया गया। अनुराधा उस परीक्षा में उतीर्ण भी हो गईं। बेटी के सफल होने के बाद भी परिवार वाले उसको बाहर पढ़ाई करने के लिये नहीं भेजना चाहते थे। लेकिन मां तो मां होती है। अनुराधा की मां बेटी की पढ़ाने के बात पर डट गईं। उन्होंने यह भी कह दिया, “यदि इस घर में रहकर मेरी बेटी को नहीं पढ़ाया जायेगा तो वे इस घर को छोड़ देंगी।” उसके बाद अनुराधा को बाहर पढ़ाई के लिये भेज दिया। उनकी 12वीं तक की पढ़ाई जवाहर नवोदय में ही हुईं। उसके बाद अनुराधा के पास आईआईटी रुड़की (IIT Roorkee) में दाखिला लेने के लिये पैसे नहीं थे लेकिन उनकी मां ने लोन लेकर अनुराधा का आईआईटी (IIT) में नामांकन करवाया।

उसके बाद अनुराधा ने यूपीएससी की परीक्षा देने का विचार किया। परीक्षा की तैयारी करने के लिये दिल्ली चली गईं। अनुराधा अपने परिवार की आर्थिक स्थिति के बारें में अच्छी तरह से जानती थी इसलिए पैसों की कमी के कारण दिल्ली में टयूशन पढ़ाने लगी। अपने पढ़ाई का खर्च वह टयूशन पढ़ा कर निकलती थी। इसके साथ ही वह यूपीएससी की भी तैयारी पूरे लगन के साथ करने लगीं।

वर्ष 2012 में अनुराधा ने पहली बार UPSC की परीक्षा दी और पहली ही बार में सफल हो गईं। इस इम्तिहान में अनिराधा को 451वीं रैंक हासिल हुआ जिसके कारण उनका आई.आर.एस. पद के लिए चयन हो गया। उन्होंने 2 साल तक इसी पद पर नौकरी की लेकिन इस पद से उन्हें संतुष्टी नहीं मिली। अनुराधा ने फिर से यूपीएससी की तैयारी शुरु कर दी। दुबारा से वर्ष 2015 में परीक्षा में बैठी। 2015 के परीक्षा में भी वे सफल रही और इस बार उन्होंने ऑलओवर 62वीं रैंक हासिल किया जो पहले के अपेक्षा काफी बेहतर था। इस बार उन्हें अपने पसंद का औधा मिला। वह IAS पद पर चयनित हुईं। IAS पद पर चयनित होकर अनुराधा ने साबित कर दिया कि यदि बेटियों को भी आगे बढ़ने का अवसर दिया जाये तो वे भी कामयाबी के शिखर को छू कर दिखायेगीं।

अनुराधा अपनी कामयाबी का श्रेय अपनी माता को देती है। वह कहती है कि मां ने मेरे लिये बहुत ही संघर्ष किया और बलिदान दिया है। आज अनुराधा के इस सफलता से उनका पूरा परिवार और पुरा गांव गर्व महसूस कर रहा है।

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