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अगर मोदी मान लें एमएसपी गारंटी की मांग तो तबाह हो जायेगा हिंदुस्तान, जान लें कैसे



नई दिल्ली। न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी देने से जिंस बाजार के गड़बड़ाने के साथ कई और भी खतरे हैं। इससे गेहूं और धान की खेती के आगे बाकी फसलों की खेती नजरअंदाज होने के आसार बढ़ जाएंगे। खेती का क्राप पैटर्न (फसल ढांचा) बिगड़ सकता है। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में फसलों के विविधीकरण की योजना फेल हो सकती है। देश के विभिन्न हिस्सों में प्राकृतिक संसाधनों का जिस तरह अंधाधुंध दोहन हो रहा है, उससे पार पाने की चुनौतियां भी बढ़ जाएंगी। एमएसपी पर होने वाली सरकारी खरीद आमतौर पर धान और गेहूं की होती है, जिसमें पंजाब व हरियाणा की भागीदारी सर्वाधिक होती है। बाकी राज्यों में इन फसलों की सीमित खरीद होती है।

गेहूं और धान की खेती के आगे बाकी फसलों की खेती हो जाएगी गौड़

सुनिश्चित खरीद होने की वजह से ही इन राज्यों में गेहूं व धान की खेती को प्रमुखता मिलती है। हैरानी इस बात की है कि इन दोनों राज्यों में परंपरागत तौर पर चावल नहीं खाया जाता। कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो क्लाइमेटिक जोन (जलवायु क्षेत्र) के हिसाब से इन राज्यों में धान की खेती नहीं की जानी चाहिए।भूजल की सिंचाई से धान की खेती करने से यहां का भूजल बहुत नीचे जा रहा है, जिससे यहां का ज्यादातर हिस्सा डार्क एरिया घोषित हो चुका है। इसी वजह से इन दोनों राज्यों में गेहूं व धान की खेती की जगह वैकल्पिक खेती को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। लेकिन इस समय एमएसपी की गारंटी मिल जाने पर फसल विविधीकरण योजना को यहां के किसान सिरे से खारिज कर देंगे।

कृषि अर्थशास्त्री राकेश कुमार सिंह का कहना है, ‘फसलों की खेती को प्रोत्साहन देने के लिए एमएसपी का प्रयोग एक साधन के रूप में किया जाता रहा है। जिन फसलों का उत्पादन बढ़ाना होता है, उन फसलों के एमएसपी में अच्छी खासी बढ़ोतरी की जाती रही है।’ सिंह का कहना है कि उपभोक्ताओं की क्रय क्षमता बढ़ने के साथ ही लोगों की थाली में खाद्यान्न के साथ डेयरी, पोल्ट्री और हार्टिकल्चर उत्पादों की मांग बढ़ी है। इन जिंसों का ज्यादातर उत्पादन लघु व सीमांत किसान करते हैं। लेकिन इन फसलों में से किसी के लिए एमएसपी निर्धारित नहीं है।

खाद्य तेलों के साथ दलहनी फसलों की मांग बढ़ने और आपूर्ति घटने से कीमतें बढ़ीं तो आयात निर्भरता बढ़ गई। सरकार ने एमएसपी बढ़ाकर दलहनी फसलों की खेती को प्रोत्साहित किया तो देश आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ गया। उसी क्रम में अब सरकार का ध्यान तिलहनी फसलों की आयात निर्भरता को घटाना है। लेकिन एमएसपी की गारंटी वाला कानून बना तो किसान का रुझान धान व गेहूं की खेती पर ही केंद्रित हो जाएगा, जिसकी खेती अन्य फसलों के मुकाबले काफी आसान होती है। इन दोनों फसलों की सरकारी खरीद को कानूनी मान्यता मिलने से यह और आसान हो जाएगा।

कृषि अर्थशास्त्री पीके जोशी का कहना है कि सरकार का काम फसलों की खरीद और बिक्री करने का नहीं होता है। सरकार का दायित्व नीतिगत फैसले लेकर एक ऐसा वातावरण तैयार करने का है जिससे मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन कायम हो सके। बाजार में खरीदारों का और विकल्प देकर प्रतिस्पर्धा का माहौल बनाए जाने की जरूरत है, जिससे कीमतों में वृद्धि हो सके और किसानों को लाभ मिल सके।
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