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कुरुक्षेत्र: मोदी के हिंदुत्व के जवाब में ममता का हिंदी कार्ड, उत्तर भारतीयों को बांट रही हैं कविता संग्रह 'मां माटी मानुष'



पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी हिंदुत्व के आधार पर हिंदू ध्रुवीकरण का दांव चलकर तृणमूल कांग्रेस के किले को फतह करना चाहती है। इसके लिए पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विकास, सुशासन और हिंदुत्व के सबसे बड़े चेहरे के रूप में उतारने की योजना बना रही है। इसके जवाब में तृणमूल कांग्रेस ने अपनी नेता और राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हिंदी प्रेम का प्रचार करना शुरू कर दिया है। यह इसलिए कि राज्य में हिंदी भाषी उत्तर भारतीयों की एक बड़ी तादाद है, और भाजपा का सबसे बड़ा फोकस इस समूह को एकमुश्त अपने साथ जोड़ना है। मोदी के हिंदुत्व के जवाब में ममता का हिंदी कार्ड कितना कामयाब होगा इसका पता विधानसभा चुनावों के नतीजों से ही चलेगा।

भाजपा के हिंदुत्व की काट के लिए बंगाली अस्मिता के साथ साथ ममता के रणनीतिकारों ने उत्तर भारतीय हिंदी भाषियों के बीच हिंदी कार्ड का दांव भी चला है। ममता बनर्जी की कविताओं के संग्रह 'मां माटी मानुष' का हिंदी अनुवाद इन दिनों उत्तर भारतीयों के बीच बंट रहा है। ममता बनर्जी ने इस पुस्तक को हिंदी भाषियों को समर्पित करते हुए इसके प्रारंभ में लिखा है समर्पित मेरे हिंदी भाषी भाई-बहनों को। कवि की कलम के शीर्षक से लिखी किताब की भूमिका की शुरुआत करते हुए ममता लिखती हैं कि कई भाषाओं की जन्मभूमि भारतवर्ष से जितना मुझे प्रेम है उतना ही प्रेम है इस पुण्यभूमि की सारी भाषाओं से भी। इन भाषाओं में हिंदी मुझे विशेष प्रिय है। संसदीय राजनीति में मेरे कदम रखने के वर्षों पहले ही इस भाषा का मेरा परिचय और संबंध दोनों स्थापित हो चुका था। केवल किसी विशेष प्रयोजन से यह भाषा सीखने के लिए मैं बाध्य नहीं हुई बल्कि बिना किसी प्रयोजन के विभिन्न क्षेत्रों में जिस तरह से यह भाषा मेरे काम आई, इसी कारण ये भाषा मेरी प्रिय भाषा बन गई।

इस तरह ममता बनर्जी अपने हिंदी प्रेम के जरिए प. बंगाल के हिंदी भाषी उत्तर भारतीयों के बीच अपनी पैठ बना रही हैं। इस पर तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता और पूर्व सांसद विवेक गुप्ता कहते हैं कि यह कोई चुनावी मुद्दा नहीं है बल्कि हिंदी और हिंदी भाषियों के प्रति दीदी का लगाव भी बहुत पुराना है। गुप्ता बताते हैं कि बंगाल में हिंदी विश्वविद्यालय की स्थापना और छठ पर्व पर राज्य में दो दिन की सरकारी छुट्टी इसका एक उदाहरण हैं।

इसी साल अप्रैल में संभावित प. बंगाल के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, गृह मंत्री अमित शाह, प्रभारी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय समेत भाजपा के सभी शीर्ष नेता इन दिनों सबसे ज्यादा ध्यान प. बंगाल पर ही दे रहे हैं। लोकसभा चुनावों में जिस तरह राज्य की कुल 42 में 18 सीटें जीत कर भाजपा ने न सिर्फ सबको चौंकाया बल्कि ममता बनर्जी के किले को भी हिला दिया, उससे राज्य में भाजपा के कार्यकर्ताओं का मनोबल आसमान पर है। उसके बाद से ही एक-एक करके कई तृणमूल नेता पाला बदल कर भाजपा की छतरी के नीचे जा रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद तृणमूल कांग्रेस के नेता और ममता बनर्जी के करीबी लोग यह दावा कर रहे हैं कि भाजपा कुछ भी कर ले, ममता दीदी अपनी सरकार की हैट्रिक लगाने जा रही हैं।

ममता के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने तो भाजपा को दहाई संख्या से ज्यादा पार करने की खुली चुनौती देते हुए यहां तक कह दिया कि अगर भाजपा विधानसभा चुनावों दहाई का आंकड़े से ज्यादा सीटें जीत जाए यानी 99 से ज्यादा सीटें जीत ले तो वह चुनाव रणनीतिकार का अपना काम छोड़ देंगे। उनकी इस चुनौती के दो मायने हैं। पहला ये कि प्रशांत किशोर को पूरा आत्म विश्वास है कि प. बंगाल में भाजपा की सरकार नहीं बनेगी और तृणमूल कांग्रेस फिर अपनी सरकार बनाएगी भले ही उसकी सीटें पिछली बार से कुछ कम रह जाएं। साथ ही, इसके दूसरे मायने ये भी हैं कि पिछले चुनाव में महज पांच सीटें जीतने वाली भाजपा इस बार भले ही सरकार न बना पाए लेकिन अगर सौ से कुछ कम सीटें भी जीत लेती है, तो वह तृणमूल कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती साबित होगी। इससे एक बात तो साबित है कि ममता बनर्जी के रणनीतिकार भी मानते हैं कि भाजपा की चुनौती को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

तृणमूल के ही एक अन्य नेता ने अनौपचारिक बातचीत में नाम न छापने की शर्त पर माना कि भले ही इस बार भी तृणमूल कांग्रेस की सरकार राज्य में बन जाएगी, लेकिन भाजपा भी 75 से सौ के बीच सीटें अगर जीतती है तो अगली सरकार का सहजता से काम करना मुमकिन नहीं होगा। इस तृणमूल नेता के मुताबिक जो भाजपा अभी पैसे और भय के बल पर तृणमूल कांग्रेस के मंत्रियों, विधायकों और कार्यकर्ताओं को तोड़ कर ममता सरकार को परेशान करने और असहज करने की कोशिश लगातार कर रही है, अगर चुनाव बाद विधानसभा में उसकी तादाद सैकड़े के आसपास पहुंच गई तो अपने धन और केंद्रीय सत्ता के बल पर भाजपा ममता सरकार को अस्थिर करने की पूरी कोशिश करेगी।




इस तृणमूल नेता के मुताबिक अगर भाजपा सौ के आस-पास सीटें जीत जाती है तो फिर कर्नाटक और मध्य प्रदेश मॉडल पर प. बंगाल में कुछ भी हो सकता है। इसलिए इस बार भी प. बंगाल की जनता को यह तय करना है कि अगर उसे राज्य की अस्मिता और हित में ममता बनर्जी की मजबूत सरकार चाहिए तो वह तृणमूल कांग्रेस को पिछली बार की ही तरह सवा दो सौ सीटों से ज्यादा का बहुमत दे।




भाजपा ने 2014 के बाद से ही ममता बनर्जी के खिलाफ प. बंगाल में हिंदुत्व के मुददे को गरम करके हिंदू ध्रुवीकरण की राजनीति शुरू कर रखी है। यहां तक कि ममता बनर्जी को मुस्लिम परस्त साबित करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गई है। अपने प्रचार तंत्र के जरिए भाजपा ने लगातार ममता के खिलाफ हिंदू विरोधी होने का माहौल लगातार बनाया है। दुर्गा पूजा के बाद मूर्ति विसर्जन का मुद्दा हो या ममता को चिढ़ाने के लिए लगातार उनके सामने जय श्रीराम का नारा अपने कार्यकर्ताओं से लगवाना और फिर उसे मीडिया में मुददा बना कर ममता को घेरकर हिंदुत्व के ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है।




इसके साथ ही भाजपा ने ममता के खिलाफ अपने कार्यकर्ताओं की हत्या का मुद्दा भी गरम किया है। पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर कथित रूप से ममता समर्थकों के हमले को भी भाजपा ने बेहद धारदार मुद्दा बनाया है। हिंदुत्व के जरिए भाजपा सबसे ज्यादा उन उत्तर भारतीयों को अपने साथ लेना चाहती है जो उसे अपनी पार्टी मानते हैं और जिन्हें अयोध्या के राम मंदिर और जय श्रीराम का नारा बेहद आत्मीय लगता है। लेकिन महज उनसे बात नहीं बनेगी और बंगाल में देवी का पूजा घर-घर होती है, इसलिए दुर्गा पूजा के अवसर पर मूर्ति विसर्जन की राजनीति उसे आम बंगाली को हिंदुत्व के छाते के नीचे लाने के लिए जरूरी लगती है। जबकि सुशासन और कानून व्यवस्था का मुद्दा उठाकर भाजपा चाहती है कि विकास और सुशासन के मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस और ममता सरकार को घेर सके। वहीं एक सधी हुई रणनीति के तहत किश्तों में तृणमूल मंत्रियों, विधायकों एवं अन्य नेताओं को भाजपा में पाला बदल करवा कर भाजपा राज्य के भीतर बाहर ममता खेमें में भगदड़ का माहौल भी बना रही है

भाजपा के इन सारे तीरों की काट के लिए ममता बनर्जी ने भी अपने तरकश से बाण चलाने शुरू कर दिए हैं। भाजपा के हिंदुत्व की काट के लिए उन्होंने बेहद आक्रामक तरीके से बंगाली अस्मिता का दांव चल दिया है। तृणमूल कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि आजादी के बाद से ही प. बंगाल की जनता ने राष्ट्रीय दलों की और उनके नेताओं की तुलना में बंगाल के नेतृत्व को ही चुना है। कांग्रेस के जमाने में विधान चंद्र राय, फिर वाम मोर्चे के ज्याति बसु और अब ममता बनर्जी इसके उदाहरण हैं। करीब 34 सालों तक पहले ज्योति बसु और फिर बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में माकपा नेतृत्व वाली वाम मोर्चे की सरकार रही और पिछले दस साल से ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल की सरकार है। भाजपा बहुत कोशिश के बावजूद अभी तक ममता से बड़ा क्या उनके बराबर का भी कोई बंगाली नेतृत्व विकसित नहीं कर पाई है। इसलिए ममता बनर्जी ने न सिर्फ बाहरी बनाम स्थानीय के मुद्दे को गरम किया है बल्कि अब वह बंगाली अस्मिता से जुड़े हर मुद्दे को उठा रही हैं।
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