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चीन की ओर निकल रही इन गुप्त सुरंगों की सच्चाई जानकर, आपको लगेगा झटका



नई दिल्ली: लेह-मनाली मार्ग पर सबसे अलग जमी हुई गुफाएं, समुद्र तल से 4,000 मीटर ऊपर सिर्फ बर्फ नजर आती है। पहाड़ों से कटा रास्ता खतरनाक है, लेकिन एक हिस्सा है जो प्राचीन भारत को चीन और मध्य एशिया से जुड़ता है। यह मार्ग को सिल्क रूट कहा जाता है। जो भी व्यापारी, यात्री और तीर्थयात्री इस रूट से गुजरे उन्हें वर्षों तक जाना गया। यह ज्ञात नहीं है कि वे यहां से निकलने के बावजूद जिंदा कैसे बचे?

लखनऊ के बीरबल साहनी इंस्टिट्यूट ऑफ पलायोसाइंसेज के भू-वैज्ञानिकों ने इस पर एक अध्ययन किया। अध्ययन की मानें तो शायद का जवाब उन्हें मिला है। अध्ययन के मुताबिक, उत्तर में लेह से पहले आखिरी मार्ग से आगे की गुफाओं का एक चक्रव्यूह हो सकता है जो लद्दाख घाटी के रुमटे, ससोमा, सुमडो, गया और मेरू गांवों के पास मिल सकता है। इन गुफाओं में लगभग आठ-12 फीट ऊंचे और 10 फीट चौड़े, जीवन के निशान मिले हैं- टूटे हुए बर्तन, दीये, कालिख और उनके अन्य बिखरे हुए सामान मिले हैं।

ट्रांसहूमेंट समुदाय करता था प्रयोग
यह अध्ययन जरनल ऑफ आर्किलॉजिकल साइंसेस में छपा है। इसके मुख्य लेखक डॉ. अनुपम शर्मा ने कहा, ‘ऐसा लगता है कि गुफाएं 11 वीं शताब्दी से पहले से उपयोग में थीं।’ उन्होंने बताया, “गुफाओं का उपयोग यात्रियों और ट्रांसहूमेंट समुदाय गर्मियों में करता था, लेकिन वे पूरे साल उपयोग में रहे।’ ट्रांसहूमेंट समुदाय, वह है जो गर्मियों और सर्दियों के मौसम के हिसाब से पशुधन के साथ चलते हैं।

18वीं-19वीं शताब्दी से रूट का प्रयोग बंद होने की आशंका
जब सिल्क रूट संपन्न रहा होगा तब मध्य और दक्षिण एशिया के बीच लद्दाख अभिसरण बिंदु था। सिल्क रूट (दक्षिणी शाखा) पर अमृतसर (उत्तर-पश्चिम भारत) और यारकंद (दक्षिण-पश्चिम चीन) को जोड़ने वाले लद्दाख मार्ग पर 60-दिवसीय यात्रा 18 वीं 19 वीं सदी के अंत तक व्यापारियों द्वारा की गईं जब भारत और चीन के बीच मुख्य भूमि सीमाएं रणनीतिक कारणों से बंद कर दी गईं।

गुफाओं में इंसानों के प्रयोग के सूबत
सह लेखक डॉ. अमृतपाल सिंह चड्ढा ने कहा, “हिमालयी अर्थव्यवस्था मध्य एशिया और चीन के साथ अपने व्यापार पर निर्भर थी।” इन क्षेत्रों में मानवीय उपस्थिति के प्रमाण नए नहीं हैं। लेकिन सर्दियां काफी लंबी होती हैं और पहाड़ तीन से चार महीने तक बर्फ से ढके रहते हैं। हवा तेज होती है, बमुश्किल ही बारिश होती है और सब्जियां केवल घाटियों तक ही सीमित रहती हैं। हमें गुफाओं की छत पर कालिख मिली। यह 17 वीं -18 वीं शताब्दी की है…माना जाता है कि यह अंतिम ज्ञात तिथि है, जब इंसानों ने इस गुफा का प्रयोग किया।

गुफाओं में मिली तेल वाली चिपचिपी कालिख
लद्दाख के सैंपलों से पता चलता है कि इन गुफाओं के अंदर लकड़ी को जलाया गया, जिससे छत पर एक कठोर, चिपचिपा, चमकदार और रालयुक्त काले रंग की कालिख जमा हुई। पेपर में लिखा है, “इस तरह की कोटिंग आग से संबंधित गतिविधियों (खाना पकाने और हीटिंग) द्वारा उत्पन्न संघनित धुएं का परिणाम हो सकती है। सबसे अधिक संभावना है कि गुफाओं के अंदर रहने योग्य परिस्थितियों को बनाए रखने के लिए ऐसा किया गया हो।” इसके अतिरिक्त हो सकता है कि गुफाओं में रोशनी करने के लिए तेलयुक्त मशालों का प्रयोग किया गया हो और उससे यह धुआं निकला हो।

‘बौद्ध धर्म के लोग करते होंगे प्रयोग’
शर्मा ने कहा, “पास के स्तूप और माने (छोटी बौद्ध संरचनाएं) की मौजूदगी से लगता है कि गुफाएं धार्मिक उद्देश्यों के लिए भी हो सकती हैं।” समय के साथ, गुफाओं के अंदर प्रदूषण ने उन्हें यह छोड़ने पर मजबूर कर दिया होगा। न्यूमोकोनियोसिस, धूल से सांस लेने के कारण होने वाली फेफड़ों की बीमारियां, लद्दाख में बहुत ज्यादा होती हैं। दो शताब्दियों पहले इसी के चलते लोगों ने स्टॉपगैप आश्रयों के रूप में गुफाओं का उपयोग करना बंद कर दिया हो।
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