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बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना, भारत की खेती-किसानी के बारे में क्या जाने रिहाना


अमेरिकी पॉप स्टार रिहाना और पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग

कहावत है कि ‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना’. भारत के किसान आंदोलन (Farmers Protest) को लेकर कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है. क्योंकि आंदोलन हिंदुस्तान में लेकिन चिंता अमेरिकी पॉप स्टार को हो रही है. रिहाना (Rihanna) ने ट्वीट किया है, “हम इस बारे में बात क्यों नहीं कर रहे हैं?” ये वही पॉप स्टार रिहाना हैं, जिन्हें अमेरिका में जो कुछ हो रहा उसकी फिक्र नहीं है. 7 जनवरी को अमेरिका के संसद भवन कैपिटल हिल्स में जब हिंसा हुई, लोकतंत्र शर्मसार हुआ और लोगों की जान गई, तब रिहाना की जुबां से एक भी शब्द नहीं निकले. लेकिन भारत में किसान आंदोलन की फिक्र इन्हें सता रही है.

सवाल उठता है कि अमेरिकी पॉप स्टार रिहाना को भारत की खेती-किसानी के बारे में क्या कुछ पता है. क्या उन्हें ये मालूम है कि भारत में किसानों की संख्या कितनी है? क्या उन्हें ये पता है कि भारत में कितने तरह की फसलें होती हैं? या फिर उन्हें पता है कि जिस MSP को लेकर किसान आंदोलन हो रहा है, उसका मतलब क्या है? जाहिर है, ऐसे सवालों का जवाब रिहाना के पास नहीं होंगे क्योंकि एक विदेशी पॉप स्टार को भारत की खेती किसानी से क्या लेना देना? जब किसी को ये सब पता नहीं है, तो फिर भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा की फसल में खाद पानी डालने का काम क्यों कर रही हैं या किसके उकसावे में कर रही हैं.

वैसे भारत के किसान आंदोलन पर विदेशी ट्विटर ज्ञानियों की फेहरिस्त लंबी है. रिहाना के अलावा पॉर्न स्टार मियां खलीफा ने भी किसानों के समर्थन में ट्वीट किया और लिखा मानवाधिकारों का उल्लंघन, ये क्या हो रहा है? अब सोचिए कि एक पॉर्न स्टार भारत के किसानों की फिक्र कर रही हैं. एक पॉप गायिका को भारत के किसानों की चिंता सता रही है. आखिर ये सब क्यों हो रहा है. क्या ये भारत की छवि के खिलाफ प्रोपेगेंडा है? क्या भारत के खिलाफ कुछ लोग ऐसे हैं जो इस ताक में बैठे हैं कि भारत की छवि को जब भी धूमिल करने का मौका मिले तो वो कूद पड़ें.

सबका ट्वीट एक जैसा क्यों?

TV9 भारतवर्ष ने जब रिहाना को लेकर पड़ताल की तब पता चला कि कनाडा में एक सांसद हैं, जगमीत सिंह जिन्हें पॉप स्टार रिहाना ट्विटर पर फॉलो करती हैं. रिहाना के इस ट्वीट पर जगमीत सिंह ने कमेंट भी लिखा है और इसकी तारीफ भी की है. हालांकि हम ये नहीं कह रहे है कि रिहाना के इस ट्वीट का इससे सीधा कोई लेना देना है. लेकिन कहा ये जाता है कि ऐसा इन्फ्लुएंस मार्केटिंग के तहत होता है. मतलब जिनके फॉलोअर्स बड़ी तादाद में होते हैं उनसे ऐसे ट्वीट करवाए जाते हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक मैसेज पहुंचे.

इसके अलावा स्वीडन की पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने ट्वीट कर कहा कि हम भारत के किसानों के आंदोलन के साथ एकजुट खड़े हैं. अब यहां रिहाना, मियां खलीफा और ग्रेटा थनबर्ग के ट्वीट में समानता देखिए. सबने CNN की खबर को अपने ट्वीट में अटैच किया है और एक ही फोटो पोस्ट की है. मतलब विदेशों में किसान आंदोलन को लेकर सबकी फिक्र एक जैसी है. लेकिन किसी को ये नहीं दिखता कि किसान आंदोलन के नाम पर 26 जनवरी को यहां क्या कुछ हुआ? किसानों के नाम पर कैसे नंगा नाच किया गया? दिल्ली को 11 घंटे तक बंधक बना लिया गया. ट्रैक्टर को हथियार बनाकर 500 पुलिसवालों पर हमला किया गया. जिनमें से कई अभी भी अस्पतालों में हैं. इनके प्रति संवेदना ना तो विदेशों में जताई जा रही है, ना ही हमारी संसद में.

हालात तो यहां तक है, जब दिल्ली बॉर्डर पर पुलिस ने बैरिकैडिंग बढ़ा दी है, कंटीले तारों का घेरा लगाया है और फिर कभी अचानक उपद्रवी ट्रैक्टर दिल्ली में ना घुसें इसके लिए बॉर्डर की सड़कों पर कीलें लगाई गई हैं तो इसमें भी गलती पुलिस की ही दिखती है. मतलब जब 26 जनवरी को दिल्ली में ट्रैक्टर घुसे तो भी सवाल पुलिस पर ही उठे और जब वैसी घटना दोबारा ना हो, उसे रोकने की कवायद की जा रही है तो फिर आलोचना पुलिस की ही हो रही है. यानी पीटे तो भी पुलिस की गलती और पिटे तो भी पुलिस की गलती.

पुलिस पर हुए हमले की चिंता कौन करेगा?

अमेरिका में जो बाइडेन के शपथ ग्रहण की तैयारियों में वाशिंगटन को छावनी में बदल दिया गया, लेकिन भारत में गणतंत्र पर्व के दिन जब किसानों के दिल्ली घुसने की तैयारी थी तब भी पुलिस ने बातचीत के मुताबिक किसानों पर भरोसा रखा. और सुरक्षा के इंतजाम तय कार्यक्रम के मुताबिक ही किए गए. इतने के बावजूद लोगों को खाकी का संयम नहीं दिखता. इनके प्रति उनकी सहानुभूति नहीं दिखती.

अगर रिहाना जैसे लोगों को किसान आंदोलन को लेकर फिक्र ही करनी है, तो इस बात की फिक्र करें कि बार-बार सरकार से बातचीत के बाद किसान आंदोलन जारी क्यों है? जब सरकार किसानों की ज्यादातर मांगें मान चुकी हैं. तो फिर किसान आंदोलन को जारी रखने का मतलब क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं जो एजेंडा किसान आंदोलन को लेकर हिंदुस्तान में चलाया जा रहा है, उसी का प्रोपेगेंडा विदेशों में फैलाया जा रहा है.

भारत को बदनाम करने के लिए तैयार बैठे ‘विदेशी’

कुछ लोग इस इंतजार में बैठे हैं कि भारत को बदनाम करने का मौका मिले और वो इसमें कूद पड़ें. यहीं से हिंदुस्तान के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैलाने की कवायद शुरू हो जाती है. लेकिन सवाल उठता है कि रिहाना या मियां खलीफा जैसे लोगों के इस खेती किसानी के ज्ञान में खाद-पानी कौन डालता है. कहा जाता है कि इसके पीछे इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग होती है, लेकिन किसान आंदोलन को लेकर भारत की छवि धूमिल करने में विदेशी मीडिया भी पीछे नहीं है.

जैसा कि हमने बताया कि रिहाना, मियां खलीफा और ग्रेटा थनबर्ग जैसे लोगों ने CNN की बेवसाइट को अपने ट्वीट में अटैच किया था. CNN में लगातार किसान आंदोलन को लेकर भारत की छवि के विपरीत कहानी लिखी जा रही है. इसके अलावा द न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट, द गार्डियन, फ्रांस 24, ऐसे कई विदेशी अखबार हैं जो भारत के किसान आंदोलन को लेकर प्रोपेगेंडा वाली रिपोर्टिंग कर रहे हैं. हालांकि ऐसे लोग हिंदुस्तान में भी हैं.
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