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हर शादीशुदा महिला को पता होना चाहिए अपने ये 8 कानूनी अधिकार



शादी एक गहरी नीव है, जो समाज में लोगों को और परिवार को आपस में बांध कर रखती है। बहुत से लोग शादीशुदा जिंदगी को सफल तरीके से जीने में कामयाब हो जाते हैं, वहीं बहुत से लोगों के लिए यह एक खौफनाक और कठिन परिस्थिति बन जाती है। ऐसे कई मामले सामने आते हैं, जिनमें महिलाएं सालों तक अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों को सहती रहती हैं, क्योंकि उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी नहीं होती है। इस कड़ी में हम आपको इंडियन लीगल राइट्स या उन अधिकारों के बारे में बताएंगे, जो महिलाओं के हित को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं और जिनके बारे में सभी को जरूर पता होना चाहिए।

मैट्रिमोनियल होम या पति के घर में रहने का अधिकार
एक पत्नी को मैट्रिमोनियल होम या अपने ससुराल में रहने का पूरा अधिकार है। चाहे परिस्थिति किसी भी तरह की हो, चाहे उनके पति की मृत्यु ही क्यों ना हो गई हो फिर भी एक पत्नी अपने ससुराल में रह सकती है। अगर बात तलाक तक पहुंच चुकी है, तब भी एक पत्नी अपने पति के घर में तब तक रह सकती है, जब तक कि उसे रहने के लिए दूसरी उचित जगह नहीं मिल जाती। अगर महिला उसी घर में रहना चाहे, तो ये भी उसके लीगल हक में है।

तलाक का अधिकार
हिंदू मैरिज एक्ट सेक्शन 13, 1995, के अंतर्गत एक महिला अपने पति की सहमति के बिना भी उस स्थिति में तलाक लेने का अधिकार रखती है, जब उसके साथ पति ने बेवफाई की हो, या उस महिला के साथ निर्दयता या शारीरिक और मानसिक अत्याचार आदि किया हो। इसके साथ ही महिला अपने पति से मेंटेनेंस चार्ज की मांग कर सकती है। ‘इंडियन पेनल कोड’ सेक्शन 125, के तहत एक पत्नी अपने और अपने बच्चे के लिए अपने पति से फाइनैंशल मेंटेनेंस की मांग कर सकती है, खासतौर से तब, जब उसका पति ज्यादा कमाता हो।

स्त्रीधन का अधिकार
Hindu Succession act 1956 में सेक्शन 14 और Hindu Marriage act 1955 में सेक्शन 27, के अंतर्गत एक महिला स्त्रीधन को अधिकारपूर्वक और मालिकाना हक के साथ मांग सकती है। अगर उसके इस अधिकार का हनन होता है, तो ऐसी परिस्थिति में वह The protection of Women Against Domestic Violence Act में सेक्शन 19 A, के अंतर्गत शिकायत दर्ज करा सकती है।

बच्चे की कस्टडी का अधिकार
एक महिला के पास इस बात का पूर्ण रूप से अधिकार होता है कि वह अपने बच्चे की कस्टडी की मांग कर सकती है। खासतौर पर यदि बच्चा 5 साल से छोटा हो। इसके साथ ही अगर वह अपना ससुराल छोड़ कर जा रही है, ऐसी परिस्थिति में भी वह बिना किसी कानूनी ऑर्डर के अपने बच्चे को अपने साथ ले जा सकती है। इसके साथ ही एक समान कस्टडी का अधिकार प्राप्त होने के बावजूद भी अगर घर में विवाद की स्थिति पैदा होती है, तो महिला अपने बच्चे की कस्टडी अपने पास रख सकती है।

अबॉर्शन का अधिकार
इसके साथ ही एक महिला के पास अपने गर्भ में पल रहे बच्चे को गिराने का अधिकार होता है। इसके लिए उसे अपने ससुराल या अपने पति की सहमति की जरूरत नहीं है। The Medical Termination of Pregnancy Act, 1971, के अंतर्गत एक महिला अपनी प्रेगनेंसी को किसी भी समय खत्म कर सकती है, इसके लिए प्रेगनेंसी का 24 सप्ताह से कम का होना जरूरी है। कुछ स्पेशल केस इसमें एक महिला अपने प्रेगनेंसी को 24 सप्ताह के बाद भी अबॉर्ड करा सकती है, इसके लिए इंडियन कोर्ट ने उसे अधिकार दिया है।

संपत्ति का अधिकार
The Hindu Succession Act, 1956 में 2005 में हुए संशोधन, के बाद एक बेटी चाहे वह शादीशुदा हो या ना हो, अपने पिता की संपत्ति को पाने का बराबरी का हक रखती है। इसके साथ ही महिला अपने पूर्व पति की संपत्ति पर अपना अधिकार जता सकती है। हालांकि, ये उस स्थिति में संभव है, जब उसके पति ने उसे अपनी संपत्ति से बेदखल करने संबंधित वसीयत न बनाई हो। इसके साथ ही अगर किसी महिला का पति तलाक के बिना दूसरी शादी कर लेता है, तो उस परिस्थिति में पति की पूरी संपत्ति पर उसकी पहली पत्नी का अधिकार होता है।

घरेलू हिंसा के खिलाफ रिपोर्ट करने का अधिकार
Domestic violence Act 2005, के अंतर्गत एक महिला को यह अधिकार प्राप्त है, कि अगर उसके साथ उसका पति या उसके ससुराल वाले शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सैक्शुअल या आर्थिक रूप से अत्याचार यो शोषण करते हैं, तो वह उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करवा सकती है।

दहेज और उत्पीड़न के खिलाफ रिपोर्ट करने का अधिकार
Dowry Prohibition Act 1961 के तहत, एक महिला को यह अधिकार प्राप्त है कि अगर उसका पैतृक परिवार या उसके ससुराल के लोगों के बीच किसी भी तरह के दहेज का लेन-देन होता है, तो वह इसकी शिकायत कर सकती है।IPC के Section 304B और 498A, के तहत दहेज का आदान-प्रदान और इससे जुड़े उत्पीड़न को गैर-कानूनी व अपराधिक करार दिया गया है।
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