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यूपी में योगी की तेजी उत्तराखंड में CM त्रिवेंद्र को ले डूबी



नई दिल्ली/देहरादून: उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की विदाई क्यों हुई? आखिर बीजेपी को अचानक ऐसा क्यों लगने लगा है कि उनके चेहरे पर अगले साल होने वाला चुनाव लड़ना पार्टी को डुबो सकता है? बावजूद इसके कि बीजेपी के पास PM नरेंद्र मोदी के नाम का एक ऐसा ट्रंपकार्ड है, जो पहाड़ों पर खूब चला है। बल्कि दौड़ा है।

उत्तराखंड की सियासी फिजाओं में तैर रहे इन सवालों के जवाब दिल्ली में बीजेपी मुख्यालय के गलियारों में ढूंढे जा रहे हैं। हालांकि, जवाब पहाड़ी राज्य में ही मौजूद हैं। आप थोड़ा टटोलना शुरू करेंगे, तो एक-एक कर इसका जवाब मिलता चला जाएगा।

क्या आप मुख्यमंत्री के काम से खुश हैं? आज से करीब 5 महीने पहले मैंने यह सवाल बद्रीनाथ यात्रा के दौरान वहां मौजूद एक पुजारी से पूछा, तो वह लगभग फट पड़े थे। उनका गुस्सा लॉकडाउन के कारण चौपट हुए काम-धंधों और मंदिरों को चारधाम श्राइन बोर्ड के दायरे में लाने को लेकर था। लेकिन उनके निशाने पर बीजेपी और मोदी नहीं, सीएम रावत थे।

‘BJP-मोदी तो ठीक हैं, लेकिन CM रावत…’
मेरे लिए यह बात इसलिए भी हैरान करने वाली थी क्योंकि उत्तराखंड के सुदूर सीमांत इलाके में मुझे असंतोष की झलक मिली थी। और वह भी उस तबके में जिसे भगवा पार्टी का परंपरागत वोटबैंक माना जाता है। लॉकडाउन के बाद के दिनों में उत्तराखंड में की गईं अपनी यात्राओं में मैंने यह सवाल कई मर्तबा, कई लोगों से किया। जवाब कमोबेश एक जैसा ही मिलता रहा- मोदी और बीजेपी तो ठीक हैं, लेकिन सीएम…।

एक साल में कौन सा नया धुरंधर कर लेगा कमाल?
चुनाव से करीब-करीब एक साल पहले बीजेपी, राज्य में चेहरा बदलने के लिए जिस तरह से आतुरता दिखाई उससे लगता है कि देर-सवेर सही, लेकिन उसने इसे भांप लिया। अब बड़ा सवाल यह रहेगा कि बीजेपी अगर अपने पत्ते फेंट भी लेती है, तो इतने कम समय में क्या वह डैमेज कंट्रोल कर पाएगी? आखिरी बीजेपी के पास वह कौन सा करिश्माई बल्लेबाज है, जो सियासी पिच पर आखिर गेंद पर छक्का जड़ देगा?

यूपी में योगी के तेजी रावत की ‘सुस्ती’ बन गई
18 मार्च 2017 में बीजेपी ने यूपी और उत्तराखंड में प्रचंड जीत की होली खेली थी। 70 में से 57 सीटों की भारी जीत और उम्मीदों के साथ रावत ने कुर्सी संभाली थी। संयोग की बात थी कि उसके ही अगले दिन यूपी में उन योगी आदित्यनाथ ने भी में सीएम की कुर्सी संभाली, जो उनके ही गृह जनपद पौड़ी से आते हैं।

प्रदेश भले ही अलग थे, लेकिन पहले ही दिन से रावत और योगी के काम की तुलना होती रही और हो रही है। रावत पर निष्क्रिय सीएम का ठप्पा लगाने का एक काम यूपी में योगी की तेजी ने भी किया। गाहे-बगाहे यूपी में योगी की सख्त छवि और हर अच्छे काम की तुलना त्रिवेंद्र सिंह रावत से होती रही और वह अपनी अलग ही छवि में कैद होते रहे।

गैरसैंण कमिश्नरी का ऐलान बगावत को अंजाम तक पहुंचा गया
पिछले चार सालों में कई काम रावत की छवि को गढ़ते चले गए, लेकिन हाल ही में गैरसैंण कमिश्नरी का ऐलान, जो उनका आखिरी फैसला रहा, उनके कैबिनेट सहयोगियों को भी बगावत की हद तक नाराज कर गया। देहरादून के सियासी हलकों के चर्चा है कि चमोली, रुद्रप्रयाग, अल्मोड़ा और बागेश्वर को लेकर अलग कमिश्नरी के फैसले की खबर खुद उनके कैबिनेट सहयोगियों तक को नहीं थी।
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